अमर ने कहा था, सभी नौ रसों का स्वाद चखा है

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नई दिल्ली
नहीं रहे। अमर सिंह राजनीति के ऐसे किरदार थे तो कभी खुली किताब लगते थे तो कभी बंद रहस्यों के आवरण में बंधा एक ऐसा शख्स जिससे हर कोई जुड़ना चाहता हो। समाजवादी की राजनीति करते थे और देश के तमाम उद्योगपतियों और बॉलीवुड की दावतों-महफिलों की शान भी बनते थे। जीवन और राजनीति का कोई ऐसा रंग नहीं रहा जिसे अमर सिंह ने न देखा हो।

इन रंगों के बीच कुछ ब्लैक और ग्रे शेड भी रहे लेकिन अमर सिंह की खासियत रही कि उन्होंने कभी अपने व्यक्तित्व में दोहरा चेहरा नहीं अपनाया। जो जिया उसे न सिर्फ स्वीकार किया बल्कि इसे सामने भी रखा। अंत के दिनों में जब वह बीमार रहने लगे तो उन्होंने खुद को सक्रिय जिंदगी से अलग कर लिया। वे एकांत को पसंद करने लगे थे। जीवन-दर्शन को मानने लगे थे। बातों में कोई निराशा की बात तो नहीं करते थे लेकिन कुछ रिश्तों में आई कड़वाहट को लेकर वे अंत तक पीड़ा में जरूर रहे।

अमर सिंह ने बीमार होने से ठीक पहले एनबीटी के साथ इंटरव्यू में कहा था, ‘हमारे चरित्र की विविधता तो है। जीवन के नौ रस हैं और हमने नौ रसों का रसास्वादन किया है। मुझे यह कहने में कोई लज्जा नहीं। जब आप नौ रसों का रसास्वादन करिएगा- गीत, नृत्य, संगीत, राजनीति यत्र तत्र सर्वत्र आप दिखाई देंगे तो एक व्यक्ति के अंदर इतनी विविधता दिखाई देगी तो वह आपको आकर्षक भी बनाएगी, चर्चित भी बनाएगी और विवादित भी बनाएगी।’

बीमारी के बारे में उन्होंने बताया- ‘संभवत हमारे चरित्र का जो एक समन्वय रहा… और ये आपको बीमार भी बना गया। समां जलती है और एक तरफ से जलती है तो भी वह खत्म हो जाती है। अगर आप उसे दोनों छोरों से जलाइए तो वह जल्दी खत्म हो जाएगी। ईश्वर ने हमें एक जीवन दिया है, उस एक जीवन में अगर हम ये भी करेंगे, वो भी करेंगे तो उसका असर पड़ता है और पड़ा भी है।’

उन्होंने बताया, ‘मेरे दोनों गुर्दे गए, किडनी ट्रांसप्लांट करवाना पड़ा। मेरी आंतें नहीं हैं। हर जो चीज चमकती है वह सोना नहीं होती। आप जिससे बातें कर रहे हैं उस व्यक्ति के पास 70 प्रतिशत आंत नहीं है, उसके दोनों गुर्दे खत्म हो चुके हैं, वह प्रत्यारोपित गुर्दे और दवाओं पर जिंदा है लेकिन मैं बहुत विनम्रता से कहूंगा कि कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। कई सारी बातें आती हैं मेरे बारे में लेकिन सभी सत्य नहीं होता। राजनीति में सत्य सत्य नहीं होता बल्कि अवधारणा सत्य होती है। ये राजनीति और स्टॉक मार्केट एक सा मामला है।’

अमिताभ से रिश्ते को लेकर हो जाते थे भावुक
कभी अमर सिंह-अमिताभ बच्चन की दोस्ती की मिसाल दी जाती थी लेकिन बाद के सालों में दोनों के बीच कटुता हो गई थी। अंत तक अमर सिंह को इसकी कचोट रही। उन्होंने इसी इंटरव्यू में कहा था, ‘बहुत ज्यादा हुआ। अमिताभ बच्चन और अनिल अंबानी, इनसे मैं नाराज नहीं हूं। खासकर अमिताभ जी से तो बिल्कुल नाराज नहीं हूं। इन्होंने मेरे अंदर के व्यक्ति के व्यक्तितत्व को मारा। मेरे अंदर जो व्यक्ति सहज सुलभ था जो बढ़चढ़कर लोगों की मदद के लिए तत्पर रहता था उस व्यक्ति की मृत्यु अमिताभ जी के आचरण के कारण हुई है क्योंकि गरज परस्त जहां में वफा तलाश न कर… ये वो शह है जो बनी है किसी और जहां के लिए… न तू जमीं के लिए है न आसमां के लिए। तेरा वजूद तो है सिर्फ दास्तां के लिए।’

उन्होंने कहा कि मुझे नहीं लगता कि बच्चन परिवार से टूट के बाद मैं किसी पर इतना विश्वास कर पाऊंगा, इतना प्यार कर पाऊंगा। मैं नहीं समझता कि ये एक अच्छी बात है। इस चीज ने मेरे व्यक्तित्व को, मेरे सोचने के तरीके को, लोगों की तरफ मेरे देखने के अंदाज को सब चीज को काफी बदला है। और इस बदलाव से व्यक्तिगत लाभ मुझे हुआ है। पिछले 6-7 सालों में आर्थिक रूप से और व्यक्तिगत रूप से मैं अपने परिवार के ज्यादा निकट आया हूं। जो समय और लोगों को देते थे वह अपने बच्चों को परिवार को देते हैं। वो कहते हैं ना कि बर्बादियों का शोक मनाना फुजूल था… बर्बादियों का जश्न मनाता चला गया क्योंकि इतने बड़े रिश्ते की बर्बादी देखने की बाद, इतने बड़े रिश्ते की मृत्यु देखने के बाद बाकी सब चीजें छोटी-मोटी लगती हैं।

जीवन के अंतिम दिनों में अमेरिका के पूर्व प्रजिडेंट बिल क्लिंटन से संबंध को लेकर भी विवाद हुआ। इस बारे में उन्होंने साफगोई से कहा था- ‘क्लिंटन से हमारे संबंध रहे हैं। बहुत दिनों से हमारी मुलाकात नहीं हुई लेकिन जब संबंध थे तो बहुत प्रगाढ़ थे।’ इतने प्रगाढ़ कि जब दिल्ली आए तो खासकर उनसे दावत के लिए लखनऊ तक गए थे।

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