विश्व संस्कृत दिवस पर सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में वर्चुअल बहेगी ज्ञान की गंगा


वाराणसी। इस वर्ष विश्व संस्कृत दिवस श्रावणी पूर्णिमा, रक्षा बंधन के दिन सोमवार को है। दिवस पर सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में विविध कार्यक्रम आयोजित है। कोरोना संकटकाल को देखते हुए सभी कार्यक्रम वर्चुअल ही आयोजित किया गया है। जिसका प्रसारण विवि के सोशल मीडिया पेज पर होगा। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो.राजाराम शुक्ल ने रविवार शाम बताया कि संस्कृत भाषा विश्व की सभी भाषाओं की जननी कही जाती है। इसी भाषा के प्रोत्साहन के लिए श्रावणी पूर्णिमा के दिन विश्व संस्कृत दिवस मनाया जाता है। दिवस को संस्कृत सप्ताह के रूप में भी श्रावणी पूर्णिमा से तीन दिन पूर्व तथा तीन दिन बाद कुल मिलाकर 7 दिन तक भी मनाया जाता है।

 उन्होंने बताया कि इस वर्ष संस्कृत दिवस को मनाने के लिए यूजीसी ने भी सभी विश्वविद्यालय से अपील की है। उन्होंने बताया कि विश्व में प्राचीन ज्ञान धारा का प्रोत्साहन तथा संरक्षण संवर्धन करना संस्कृत दिवस का लक्ष्य है। संस्कृत भाषा में ही सारे वेद निबद्ध हैं। वेद ऐसा ज्ञान राशि है जिसके प्रत्येक अक्षर अपने अपरिवर्तनीय स्वरूप को लेकर प्रसिद्ध है।

वाराणसी घनपाठ की परम्परा में प्रथम 
धर्म नगरी काशी वाराणसी घनपाठ की परम्परा में प्रथम स्थान रखती है। वेद के प्रत्येक शब्द तथा अक्षरों को यथावत् बनाये रखने के लिए वेद में तीन प्रकृति पाठ तथा आठ विकृति पाठ होते हैं। संहिता, पद और क्रम ये तीन प्रकृति पाठ हैं। जटा, माला, शिखा, रेखा, ध्वज, दण्ड, रथ, घन ये आठ विकृति पाठ के नाम हैं। ये प्रकृति तथा विकृति पाठ यजुर्वेद तथा ऋग्वेद इन दो वेद में ही होते है। 

कुलपति ने बताया कि इन सभी पाठों को कण्ठस्थ करने के लिए प्राय : 15 साल केवल वेद का ही अभ्यास करते रहना पड़ता है। इसको आजीवन धारण करने के लिए घनपाठी को प्रतिदिन न्यूनतम चार घण्टा प्रतिदिन आजीवन अभ्यास करना पडता है। इस प्रकार कठिन तपस्या करके जो सभी विकृति तथा प्रकृति को स्मरण कर लेते हैं उन्हें ही घनपाठी कहा जाता है। सभी पाठों में सबसे कठिन पाठ घनपाठ कहा जाता है। जिसका माध्यन्दिन शाखा में सम्पूर्ण पाठ करने के लिए प्रतिदिन 6 घण्टा पाठ करने पर 21 दिन लगते हैं। वाराणसी घनपाठ की परम्परा में प्रथम स्थान रखती रही है। विशेषतः माध्यन्दिन शाखा की परम्परा सभी वाराणसी से ही विकसित हुई है। 

 उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालयीय पाठ्यक्रम में घनपाठ आंशिक रूप में ही रखा गया है। वाराणसी के गुरुकुलों में यह सम्पूर्ण पाठ की परम्परा है। इस परम्परा में मुख्य तीन कुल हैं दीक्षितकुल, गोडसेकुल तथा बादलकुल। दीक्षित कुल में वेदमूर्ति लक्ष्मीकान्त दीक्षित जी वर्तमान हैं। जिन के एक शिष्य धनान्ती हैं। गोडसे कुल में बड़े गोडसे जी वेदमूर्ति श्रीकृष्ण गोडसे जी के 12 से ज्यादा शिष्य है। छोटे गोडसे वेदमूर्ति गजानन गोडसे जी के एक शिष्य हैं। बादल कुल के आचार्य वेदमूर्ति विनायक बादल जी के 8 घनान्ती शिष्य है 

उन्होंने बताया कि वेद चार होते है ऋग्वेद, यजुर्वेद, समवेद, अथर्ववेद। परन्तु इन वेदों की शाखायें बहुत अधिक होती है। ऋग्वेद की 21 शाखा, यजुर्वेद की 101 शाखा, सामवेद की 1000 शाखा, तथा अथर्ववेद की 9 शाखा। इस प्रकार वेदों की 1131 शाखायें होती हैं। किन्ही कारणों से आज केवल 12 शाखायें ही उपलब्ध है।

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