श्रीराम की तरह कुश ने भी किया था अग्निबाण संधान


अयोध्या। ‘विनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति, बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।। रामचरित मानस की यह चौपाई भगवान श्रीराम के उस समय के क्रोध को प्रदर्शित करने वाला है, जब लंका पर चढ़ाई के दौरान समुद्र उन्हें जाने की राह नहीं दे रहा था, लेकिन आपको यह जानकारी शायद ही हो, की भगवान श्रीराम के पुत्र महाराज कुश ने भी सरयू नदी के जल को सुखाने के लिए ठीक ऐसे ही क्रोधित हुए थे और अग्निबाण का संधान कर लिया था। समुद्र पर क्रोधित हुए भगवान श्रीराम ने भगवान शंकर के मंदिर की स्थापना की तो अयोध्या के सरयू तट पर क्रोधित हुए महाराज कुश ने भगवान शंकर के गले की शोभा बढ़ाने वाले नागराज के बुलावे पर यहां पहुंचे, भगवान शंकर के नागेश्वर मंदिर की स्थापना कर डाली।

भूगर्भशास्त्रियों का कहना है कि इस मंदिर या उसके आसपास का क्षेत्र अयोध्या की नाभि या उर्जास्थली है। अयोध्या क्षेत्र के पंडित रामरघुवंश मणि की मानें तो पौराणिक ग्रंथों के अनुसार नागेश्वरनाथ के रूप में प्रसिद्ध मंदिर में स्थापित शिवलिंग की स्थापना भगवान श्रीराम के पुत्र कुश महाराज ने किया था। उनकी स्मृति में नागेश्वरनाथ मंदिर के परिसर में लव-कुश की भी प्रतिमा स्थापित हैं। प्रत्येक सावन शुक्ल पूर्णिमा को उनकी जयंती भी मनाई जाती है। 

रामरघुवंश मणि के मुताबिक ग्रंथों में इस मंदिर की स्थापना का वर्ण है। ग्रंथों में वर्णित कथा के मुताबिक एक समय महाराज कुश सरयू नदी में विहार कर रहे थे। इस दौरान उनकी बहुमूल्य अंगूठी जल की धारा में विलीन हो गई। कहते हैं यह अंगूठी एक नागकन्या को प्राप्त हुई। फिर उसने अंगूठी को नाग राजा की पुत्री को सौंप दिया। इधर, अंगूठी के खो जाने से महाराज कुश को किसी अनहोनी की आशंका सताने लगी और वे उसे पाने के लिए बेचैन हो गए। अंगूठी को ढूंढने का बहुत उपाय किया, लेकिन अंगूठी उन्हें नहीं मिली।

तपोबल से जाना कहाँ है अंगूठी

फिर उन्होंने अपने तपोबल का उपयोग किया। नागराजा के कन्या के हाथों में उन्हें वह अंगूठी दिखाई पड़ी। नागकन्या से अंगूठी प्राप्त करना चाहा, लेकिन नागराजा की कन्या ने उन्हें अंगूठी वापस करने से मना कर दिया। फिर क्या था महाराज कुश की भवें तन गईं।

नागलोक को भष्म करने की दे दी चेतावनी 

कुपित महाराज कुश ने अग्निबाण का संधान किया। पूरे नाग लोक को भष्म करने की चेतावनी दे डाली। इससे नागलोक में अफरा-तफरी मच गई। नागों ने अपने राजा से इस विपत्ति से बचने के प्रयास करने की गुहार लगाई। फिर, घबराए नागराजा ने भगवान भोलेनाथ की प्रार्थना की। उनसे राह दिखाने का आग्रह किया।

भगवान शंकर ने कुश से कराया नागकन्या का विवाह

नागराजा की प्रार्थना से खुश भगवान शंकर ने उन्हें साक्षात दर्शन दिया। महाराज कुश के कोप से बचाने को राजी हो गए। उन्होंने महाराज कुश को समझा-बुझाकर शांत कराया। इसके साथ ही नागराजा की कन्या से महाराज कुश का विवाह भी कराया। 

अयोध्या की नाभि पर स्थापित हुए भगवान शंकर

विवाह के उपरांत महाराज कुश ने भगवान शंकर से सरयू तट पर ही उनके वास करने का अनुरोध किया। भगवान शंकर ने उनके अनुरोध को स्वीकार कर लिया। फिर, महाराज कुश ने उसी स्थान पर शिवलिंग की स्थापना की। अब यहां नागेश्वरनाथ मंदिर है।

भूगर्भ शास्त्री भी कहते हैं अयोध्या की नाभि पर स्थापित है नागेश्वरनाथ मंदिर 

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के भूगर्भ वैज्ञानिकों की मान्यता है कि अयोध्या क्षेत्र की नाभि अथवा उसका ऊर्जा केन्द्र, नागेश्वरनाथ मंदिर के ही आसपास पाया गया है। इस क्षेत्र में विशेष शोध के लिए एक प्रोजेक्ट भी तैयार किया गया है। अयोध्या शोध संस्थान व डॉ. राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के माध्यम से भारत सरकार को प्रेषित किया गया है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय गोरखुपर विश्वविद्यालय के भूगर्भ शास्त्री डॉ.सर्वेश कुमार कहते हैं कि प्रोजेक्ट की स्वीकृत के उपरांत वैज्ञानिक रीति से शोध प्रक्रिया शुरू होगी।

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