उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन का सिस्टम आखिर कब जागेगा? ये सवाल इसलिए क्योंकि हिमालय की ऊंची चोटियों पर खतरा लगातार बढ़ रहा है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं, नई झीलें बन रही हैं। पुरानी झीलों का आकार बदल रहा है। खुद सरकारी रिकॉर्ड कहता है कि उत्तराखंड में 13 संवेदनशील ग्लेशियर झीलें चिन्हित की गई हैं। जिनमें से 5 को बेहद संवेदनशील यानी कैटेगरी-A में रखा गया है। इसके अलावा ना जाने ऐसी कितनी झीलें और होंगी जो नई बन गई हैं और चिह्नित ही नहीं की गई होंगी।
क्या बड़ी आपदा का इंतजार कर रहा सिस्टम!
ग्लेशियर झील कितनी खतरनाक साबित हो सकती हैं ये शायद ही आपको बताने की जरूरत पड़े। जब ये झीलें टूटती हैं तो उसका पानी बड़े-बड़े बोल्ड़रों और मलबे के साथ नीचे आता है जो अपने रास्ते में आने वाले गांवों, सड़कों, पुलों, कोई भी परियोजनाओं और नदी किनारे बसे इलाकों को निगल जाता है। जैसा आपने हाल ही में नेपाल में आई आपदा में देखा ही होगा।
उत्तराखंड के केदारनाथ, धराली, रैंणी में भी हुआ कुछ ऐसा
इससे पहले उत्तराखंड के केदारनाथ, धराली, रैंणी में भी बिल्कुल ऐसा ही हुआ था। लेकिन हमारा आपदा प्रबंधन विभाग इन खरतनाक झीलों की निगरानी कितनी गंभीरता से कर रहा है ये आपको बताते हैं। साल 2024 में सरकार ने विशेषज्ञ टीम बनाई। तब वसुंधरा ताल का सर्वे हुआ और जनवरी 2025 में सरकार ने कहा कि बाकी संवेदनशील झीलों का भी चरणबद्ध तरीके से अध्ययन कराया जाएगा।
ग्लेशियर झीलों की निगरानी के लिए क्या?
ग्लेशियर झीलों की निगरानी के लिए एक फूलप्रूफ मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित किया जाएगा। लेकिन अगस्त 2026 में नेपाल त्रासदी आई। जिसके बाद आपदा प्रबंधन विभाग को फिर से कहना पड़ा कि ग्लेशियर झीलों की लगातार निगरानी के लिए आधुनिक सेंसर, वॉटर लेवल मॉनिटरिंग, ड्रोन और रियल टाइम सिस्टम अपनाए जाएंगे।
उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन विभाग सुस्त!
उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन विभाग कितना सुस्त है, इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि हिमालयी इलाकों में खतरा बढ़ता जा रहा है। लेकिन सिस्टम अभी भी सर्वे बैठक और घोषणाओं के बीच फंसा हुआ है। जनवरी 2025 में जो फूलप्रूफ सिस्टम बनाने की बात हुई थी। अगस्त 2026 तक ये सिस्टम जमीन तक पहुंचा या नहीं इसके बारे में किसी को कुछ नहीं पता।
हालांकि अब 8 सितंबर को सरस्वती ताल और केदारताल के सर्वे के लिए विशेषज्ञ दल को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया गया। आपदा प्रबंधन विभाग का कहना है कि ये दल झीलों का जलस्तर देखेगा, आकार में बदलाव देखेगा, आसपास के भू-भाग का अध्ययन करेगा। साथ ही डाउनस्ट्रीम इलाकों पर खतरे का आकलन किया जाएगा।
सर्वे के बाद क्या होगा?
लेकिन सर्वे के बाद क्या होगा? वही ढाक के तीन पात। ना तो खतरे वाले इलाकों की मैपिंग होगी, ना खतरे वाले इलाके के पास रहने वाली आबादी की सुरक्षा का कोई प्लान बनेगा। ना ही पहाड़ी इलाकों में रियल टाइम अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया जाएगा।अर्ली वार्निंग सिस्टम के लिए आया बजट उसी आपदा के पानी में बह जाएगा।
उत्तराखंड आपदा प्रबंधन विभाग में थोड़ी हरकत
नेपाल त्रासदी के बाद उत्तराखंड आपदा प्रबंधन विभाग में थोड़ा हरकत तो शुरू हुई है लेकिन लगता नहीं है कि हमारा सुस्त विभाग उत्तराखंड में राहत बचाव और आपदाओं के प्रिवेंशन के लिए कुछ कर पाएगा। क्या हमारा आपदा प्रबंधन विभाग किसी और बड़ी आपदा का इंतजार कर रहा है?
