5 चुनाव, 5 जीत… क्या कांग्रेस इस बार भेद पाएगी मदन कौशिक का अभेद्य किला?

उत्तराखंड का हरिद्वार (शहर) विधानसभा क्षेत्र राज्य की सबसे हाई-प्रोफाइल और प्रतिष्ठित सीटों में शुमार है। यह सीट भाजपा और कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक का एक ऐसा गढ़ है जिसे भेदना कांग्रेस के लिए हमेशा से एक कड़ी चुनौती रहा है। आगामी विधानसभा चुनाव में जहां भाजपा को अपने लंबे शासन से उपजी नाराजगी और नए चेहरों की आकांक्षाओं को साधना होगा, वहीं कांग्रेस को अपनी अंदरूनी गुटबाजी से ऊपर उठकर एक सर्वसम्मत और प्रभावशाली चेहरे पर दांव लगाना होगा।

विश्व प्रसिद्ध धार्मिक और आध्यात्मिक नगरी होने के कारण यह क्षेत्र केवल राष्ट्रीय स्तर पर ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उत्तराखंड की राजनीति में भी सत्ता का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है। 2002 में राज्य गठन के बाद से ही यह सीट भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सियासत का पर्याय बनी हुई है।

राज्य के पहले विधानसभा चुनाव से अब तक कौशिक का वर्चस्व

हरिद्वार शहरी सीट का चुनावी इतिहास मौजूदा कैबिनेट मंत्री और पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक के इर्द-गिर्द ही घूमता रहा है। वर्ष 2002 के पहले विधानसभा चुनाव से लेकर 2022 तक, मदन कौशिक ने लगातार पांच बार जीत दर्ज कर इस सीट को पार्टी का ‘अभेद्य किला’ बना दिया है।

2002 के पहले विधानसभा चुनाव में मदन कौशिक ने जीत हासिल कर राज्य की राजनीति में भाजपा की मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई थी। फिर 2007 के चुनाव में कौशिक ने समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता अंबरीश कुमार को शिकस्त दी। प्रदेश की सियासत में सपा के पतन के बाद 2012 में  कौशिक ने कांग्रेस प्रत्याशी सतपाल ब्रह्मचारी को लगभग 8,600 वोटों से हराया। देश की सियासत में मोदी युग शुरू होने के बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में मदन कौशिक को प्रचंड मोदी लहर का साथ मिला और उन्होंने जयराम आश्रम के प्रमुख ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी को रिकॉर्ड 35,900 से अधिक वोटों के अंतर से बुरी तरह शिकस्त दी।

2022 में यह अंतर कम हुआ लेकिन जीत कौशिक को ही मिली। उन्होंने कांग्रेस के सतपाल ब्रह्मचारी को 15,237 वोटों से मात देकर अपनी लगातार 5वीं जीत दर्ज की। लेकिन इस बार प्रदेश में जारी वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन(एसआईआर) के चलते यहां 19,713 वोट कट गए हैं, जो कि हार जीत के अंतर से ज्यादा हैं ऐसे में कौशिक के सामने चुनौती तो खड़ी ही हो गई है। यह बात और है कि देखना होगा कि किन समुदायों के वोट अधिक कटे हैं।

हरिद्वार का सामाजिक एवं जातीय गणित आस पास की ग्रामीण सीटों से जुदा

हरिद्वार शहर का चुनावी मिजाज जिले की अन्य ग्रामीण सीटों (जैसे मंगलौर, लक्सर या पिरान कलियर) की तुलना में काफी अलग है। यहां का मतदाता मुख्य रूप से शहरी और धार्मिक मान्यताओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। तीर्थ पुरोहित, स्थानीय व्यापारी, गंगा सभा से जुड़े लोग और उच्च-मध्यम वर्गीय आबादी का इस सीट पर दबदबा है, जो परंपरागत रूप से भाजपा के से लगाव रखते रहे हैं। यहां ब्राह्मण, वैश्य और पंजाबी-पहाड़ी मतदाताओं की संख्या निर्णायक भूमिका निभाती है। अखाड़े, आश्रम और प्रमुख साधु-संत यहाँ चुनावी हवा बनाने का मुख्य जरिया हैं। संतों का समर्थन चुनावी नतीजों को प्रभावित करता है। शहर के कुछ इलाकों और मलिन बस्तियों में स्थित मुस्लिम व दलित मतदाता कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक का हिस्सा माने जाते हैं, लेकिन उनकी संख्या जीत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए पर्याप्त नहीं हो पाती।

हरिद्वार की राजनीति केवल राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय मुद्दों पर नहीं, बल्कि स्थानीय नागरिक सुविधाओं पर भी टिकी है। इनमें कुंभ और अर्धकुंभ के दौरान इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास और रखरखाव। गंगा स्वच्छता व अतिक्रमण यानी नमामि गंगे योजना का प्रभावी क्रियान्वयन और शहर में बढ़ता अतिक्रमण भी मुद्दा बनता है। यहां हर की पौड़ी और आसपास के क्षेत्रों में पार्किंग और यातायात की गंभीर समस्या है, जिससे स्थानीय पर्यटन और व्यापार प्रभावित होता है।

कौशिक का दावा मजबूत मगर टिकट के दावेदार भी कम नहीं

25 सालों से अजेय रहने के बावजूद भाजपा के भीतर आगामी चुनावों को लेकर अंदरूनी सुगबुगाहट जारी है। क्योंकि टिकट के कई दावेदार हैं। हालांकि पांच  बार के विधायक, संघ व संगठन में मजबूत पकड़, व्यक्तिगत जनाधार के कारण मदन कौशिक का टिकट पक्का ही माना जाता है मगर टिकट की राह पूरी तरह निष्कंट भी नहीं। पहली बात तो यह कि वह सीएम धामी के प्रतिद्वंद्वी त्रिवेंद्र रावत गुट के करीबी माने जाते हैं। शायद यह वजह है कि सीएम धामी ने उन्हें कैबिनेट में तो लिया मगर पहले जैसा महत्व नहीं दिया। हरिद्वार से पूर्व मेयर व मनोज गर्ग भी वैश्य व व्यापारी वर्ग में पकड़ के चलते एक दावेदार हैं। स्थानीय संगठन के चेहरे आदेश सैनी और आशुतोष शर्मा भी ओबीसी. ब्राह्मण वर्ग का प्रतिनिधित्व और संगठन की नई पीढ़ी का चेहरा होने का दावा करते हैं। भाजपा के लिए सबसे बड़ा धर्मसंकट यह होगा कि क्या वह अपने पांच  बार के विधायक पर पुनः भरोसा जताए या ‘सत्ता विरोधी लहर’ को बेअसर करने के लिए नया चेहरा मैदान में उतारे।

क्या कांग्रेस तोड़ पाएगी हार का सिलसिला ?

कांग्रेस इस सीट पर बार-बार मिलती हार के सिलसिले को तोड़ने के लिए बेताब है। पार्टी की मुख्य रणनीति संत समाज और सवर्ण (ब्राह्मण-वैश्य) वोट बैंक में सेंध लगाने वाले चेहरे को आगे करने की रहती है। ऐसे में वह 2012 और 2022 में प्रत्याशी रहे पूर्व मेयर व धर्मगुरु सतपाल ब्रह्मचारी की संत समाज और आम जनता में गहरी पैठ को देखते हुए दांव लगा सकती थी लेकिन वह इस वक्त हरियाणा की सोनीपत लोकसभा सीट से कांग्रेस के सांसद हैं ऐसे में उन्हें कांग्रेस विधायक का चुनाव तो लड़ाएगी नहीं। हार के बावजूद उनकी निरंतर सक्रियता उन्हें सबसे मजबूत दावेदार बनाती है। ऐसे में कांग्रेस जयराम आश्रम के पीठाधीश्वर व 2017 में प्रत्याशी रहे ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी पर दांव खेल सकती है। वह संत समाज के एक बड़े वर्ग और आश्रम समर्थकों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसी के साथ कांग्रेस से यहां पूर्व मेयर अनीता शर्मा स्थानीय निकाय के जनाधार और महिला/व्यापारी वर्ग के दम पर दावेदारी पेश करती हैं, जबकि वरिष्ठ नेता संजय पालीवाल सांगठनिक कैडर के भरोसे टिकटार्थी हैं। लेकिन कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी की अंदरूनी गुटबाज़ी को खत्म करना और केवल पारंपरिक दलित-अल्पसंख्यक वोटों के भरोसे रहने के बजाय वैश्य-ब्राह्मण मतदाताओं का विश्वास हासिल करना है। अब देखना यह है कि 2027 के चुनाव में कांग्रेस कौन सा दांव खेलकर मदन कौशिक के सामने बड़ी चुनौती खड़ी करती है।

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