विशेष : भाजपा, कांग्रेस या बसपा किसके जनाधार पर SIR की मार ?, इस रिपोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा

देहरादून। प्रदेश में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) आखिर किस पार्टी को महंगा पड़ेगा। किस पार्टी के जनाधार पर चोट लगेगी ? यह सवाल SIR शुरू होने से ही प्रदेश को मथ रहा है कि इसका फायदा या नुकसान किस पार्टी को होगा ? भाजपा या कांग्रेस ?

SIR Uttarakhand Preliminary Report 2026 में हुआ खुलासा

कोलकाता स्थित सबर इंस्टीट्यूट (Sabar Institute) ने कुछ अरसा पहले उत्तराखंड में जारी एसआईआर पर अध्ययन रिपोर्ट ‘SIR Uttarakhand Preliminary Report 2026‘ जारी की है।  सबर इंस्टीट्यूट कोलकाता स्थित एक स्वतंत्र शोध संस्थान है जो भारत में सामाजिक असमानता, चुनावी डेटा विश्लेषण (एसआईआर-ऑडिट), और जनहित के मुद्दों पर डेटा-आधारित अध्ययन रिपोर्टें प्रकाशित करता है।

सबर इंस्टीट्यूट (रिसर्च व थिंक-टैंक) की अध्ययन रिपोर्ट कहती है कि मतदाता सूची के इस शुद्धिकरण अभियान का असर सभी वर्गों और क्षेत्रों पर एक समान नहीं पड़ा है। मैदानी औद्योगिक जिलों, महिला मतदाताओं और मुस्लिम बहुल इलाकों में नाम कटने की दर सबसे अधिक देखी गई है, जबकि पहाड़ी और अनुसूचित जाति बहुल जिलों में यह प्रभाव तुलनात्मक रूप से कम रहा है। वोट कटने का यह आंकड़ा इसलिए भी अहम है क्योंकि माना जाता है कि जहां डेढ़ दशक से महिलाओ का बड़ा हिस्सा भाजपा का रुख करता रहा है। वहां मुस्लिम, दलित कांग्रेस का जनाधार माना जाता है।

45 विधानसभा सीटों पर पड़ेगा असर

इस रिपोर्ट ने  राज्य की भावी राजनीति और चुनावी प्रक्रियाओं पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब यह रिपोर्ट तैयार की गई थी तब तक उत्तराखंड की सभी 70 विधानसभा सीटों से कुल 8,07,410 मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जा चुके थे। सबर इंस्टीट्य़ूट की रिपोर्ट की सबसे महत्वपूर्ण खोज यह है कि उत्तराखंड की 70 में से 45 विधानसभा सीटों पर काटे गए वोटों की संख्या 2022 के पिछले चुनाव के जीत के अंतर से कहीं अधिक है।

SIR का प्रदेश की महिला मतदाताओं पर भारी असर

रिपोर्ट के अनुसार, राज्यभर में जितने भी नाम सूची से हटाए गए हैं, उनमें 52 प्रतिशत हिस्सेदारी महिलाओं की है (4,19,808 महिला मतदाता), जबकि पुरुषों का प्रतिशत 48 प्रतिशत है। विशेष रूप से पर्वतीय जिलों में महिलाओं के वोट कटने की दर चौंकाने वाली है। यह धनौल्टी में  58.1 प्रतिशत, धारचूला में 57.6 प्रतिशत, केदारनाथ में 57.3 प्रतिशत और पुरोला: 56.8 प्रतिशत है। पहाड़ी क्षेत्रों से पुरुषों का बड़े पैमाने पर रोजगार की तलाश में पलायन होता है, जिससे प्रशासनिक सत्यापन और मतदाता सूची अपडेट करने का पूरा दबाव स्थानीय स्तर पर मौजूद महिलाओं पर आ जाता है।

मुस्लिम बहुल क्षेत्रों और उपनामों का ट्रेंड

2011 की जनगणना से जिलेवार आंकड़ों का मिलान करने पर मुस्लिम आबादी के अनुपात और वोट कटने की दर के बीच एक मजबूत सकारात्मक संबंध पाया गया है। कमजोर दस्तावेजी आधार के आधार पर ‘अनुपस्थित या लापता’ की श्रेणी के तहत मैदानी और मुस्लिम आबादी वाले जिलों(जैसे देहरादून में 28.4 प्रतिशत और ऊधम सिंह नगर में 26.9 प्रतिशत) में सबसे ज्यादा नाम हटाए गए हैं। हटाए गए नामों के डेटाबेस में अली, खान, अहमद, बेगम, हुसैन, और जहां  जैसे उपनाम प्रमुखता से शामिल हैं। रिपोर्ट में काटे गए कुल 8,07,410 नामों के उपनाम (Surnames) का विश्लेषण किया गया, जिसमें अहमद 5,719 , खान 2,960 , बेगम 2,792, हुसैन 2,229  और जहाँ जैसे 2,095 उपनामों पर असर पड़ा है।

रिपोर्ट में विशेष रूप से रेखांकित किया गया है कि अनुपस्थित या अनट्रेसेबल’ श्रेणी में वोट कटने की दर मुस्लिम आबादी वाले मैदानी जिलों (देहरादून में 28.4% तथा उधम सिंह नगर में 26.9%) में सबसे अधिक पाई गई है। रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि जिला स्तर पर ये केवल सांख्यिकीय पैटर्न दर्शाते हैं और आगे मतदान केंद्र स्तर पर विस्तृत जांच की आवश्यकता की ओर इशारा करते हैं।

जिन जिलों में मुस्लिम आबादी अधिक , वहाँ वोट कटने की दर अधिक

रिपोर्ट के अनुसार जिन जिलों में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत अधिक है, वहाँ वोट कटने की दर अधिक पाई गई है। जैसे ऊधम सिंह नगर में मुस्लिम आबादी 22.6% है लेकिन यहां वोट कटने की दर प्रदेश में सबसे अधिक 12.9% है।  हरिद्वार में मुस्लिम आबादी 34.3%  है यहां वोट कटने की दर 8.4% रही।  देहरादून जिले में मुस्लिम आबादी 11.9%  फीसद है यहां वोट कटने की दर  11.9% रही।  

रिपोर्ट के अनुसार, मैदान और तराई क्षेत्रों की हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर देहरादून व नैनीताल जिलों की मुस्लिम बहुल उनके असर वाली विधानसभा सीटों में भारी संख्या में नाम कटे हैं।  हरिद्वार जिले की ऐसी सात में ले छह कांग्रेस तो एक बसपा के पास है। ऊधमसिंह नगर जिले की ऐसी पांच सीटो में से तीन कांग्रेस की तो दो भाजपा की है। नैनीताल में एक सीट अभी कांग्रेस के पास है। तो देहरादून में ऐसी तीन सीटें भाजपा के पास है।

हरिद्वार जिले की बात करें तो पिरान कलियर सीट में 7,302,  मंगलौर में 8,230 , भगवानपुर (SC) में 11,700 , झबरेड़ा में 9,833 , ज्वालापुर (एससी) में 8,992 , लक्सर में 7,736 और हरिद्वार ग्रामीण में 12,914 वोट कटे हैं। पिरान कलियर कांग्रेस के फुरकान अहमद, मंगलौर कांग्रेस के काजी निजामुद्दीन, भगवानपुर कांग्रेस की ममता राकेश, झबरेड़ा कांग्रेस के विरेंद्र कुमार, ज्वालापुर कांग्रेस के रवि बहादुर, लक्सर बसपा के मोहम्मद शहजाद तो हरिद्वार ग्रामीण कांग्रेस नेता हरीश रावत की बेटी अनुपमा रावत के पास है।

उधम सिंह नगर जिला में जसपुर सीट में 16,600 , काशीपुर में 28,701 , बाजपुर (SC) में 28,520 , किच्छा में 26,071 और सितारगंज में 13,272 वोट कटे हैं। जसपुर कांग्रेस आदेश सिंह चौहान, काशीपुर भाजपा के त्रिलोक सिंह चीमा, सितारगंज भाजपा के कैबिनेट मंत्री सौरभ बहुगुणा , बाजपुर कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य के पास तो किच्छा कांग्रेस के तिलकराज बेहड़ के पास है।   

नैनीताल जिले की हल्द्वानी सीट में  16,609 वोट कटे हैं। यहां कांग्रेस के सुमित हृदयेश विधायक हैं । देहरादून की सहसपुर में 20,623 और विकासनगर में 12,513 तो धर्मपुर में 29,251 वोट कटे हैं। सहसपुर सीट इस वक्त भाजपा के सहदेव पुंडीर और मुन्ना सिंह चौहान तो धर्मपुर विनोद चमोली के पास है।  

अनुसूचित जाति आबादी वाले जिलों में खास असर नहीं

अनुसूचित जाति आबादी वाले जिलों (जैसे बागेश्वर 27.7 प्रतिशत, पिथौरागढ़ 24.9 फीसद, उत्तरकाशी 24.4फीसद) में वोट कटने की दर केवल 6.9 प्रतिशत से 7.4 प्रतिशत तक दर्ज की गई। अनुसूचित जाति की आबादी और वोट कटने की दर के बीच नकारात्मक संबंध पाया गया। पूरे राज्य में 40 थर्ड जेंडर मतदाताओं के नाम भी काटे गए हैं, जो मुख्य रूप से राजपुर रोड (5), रुड़की (5), बीएचईएल रानीपुर (4), और हल्द्वानी (3) जैसे शहरी केंद्रों में सीमित हैं।

सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र मैदानी और शहरी सीटें

राज्य की 70 सीटों में से सर्वाधिक वोट कटने वाले शीर्ष 10 विधानसभा क्षेत्र मुख्य रूप से तीन मैदानी जिलों देहरादून, ऊधम सिंह नगर और हरिद्वार में केंद्रित हैं। धर्मपुर, रायपुर, ऋषिकेश, सहसपुर, काशीपुर, बाजपुर(एससी), किच्छा, रुद्रपुर हरिद्वार, बीचईएल रानीपुर में स्थायी रूप से शिफ्ट मतदाताओं के नाम पर सबसे अधिक वोट कटे हैं।

लापता या अनुपस्थित श्रेणी पर उठते सवाल

बिना किसी मजबूत भौतिक सत्यापन के मतदाताओं को “लापता या अनुपस्थित” बताकर सूची से बाहर करने के मामलों में कई महत्वपूर्ण शहरी व औद्योगिक केंद्र सबसे ऊपर हैं। इनमें काशीपुर में 39.7 प्रतिशत (11,404 वोट), ऋषिकेश में 38.5 प्रतिशत (10,445 वोट), धर्मपुर में 36.1 प्रतिशत (10,572 वोट), सितारगंज में 33.1प्रतिशत (4,391 वोट), डोईवाला में  32.1प्रतिशत (5,856 वोट) और किच्छा में30.8 प्रतिशत (8,042 वोट) लापता या अनुपस्थित श्रेणी के हैं। इन क्षेत्रों में प्रवासी मजदूरों और किराएदारों की बड़ी संख्या के कारण प्रशासनिक लापरवाही या गलत श्रेणी निर्धारण की आशंका जताई जा रही हैं।

कटे वोटों में राजनीतिक समीकरणों को उलट-पुलट करने की क्षमता

सबर इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि एसआईआर 2026 प्रक्रिया का सबसे गहरा प्रभाव मैदानी औद्योगिक जिलों, महिला आबादी और ‘अनुपस्थित’ श्रेणी के तहत मैदानी-मुस्लिम इलाकों पर पड़ा है। चूंकि 45 विधानसभाओं में काटे गए वोटों का आंकड़ा 2022 के जीत के अंतर से काफी बड़ा है, इसलिए ये कटे वोट आगामी चुनावों के समीकरणों को पूरी तरह उलट-पुलट करने की क्षमता रखते हैं। यही नहीं यह भाजपा हो या कांग्रेस या अन्य दल सभी राजनीतिक दलों के जनाधार के आंकड़ों भी उलट-पुलट सकते हैं।

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