तत्कालीन थाना प्रभारी समेत तीन पुलिसकर्मियों को सजा

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1994 का रामपुर तिराहा कांड- फर्जी हथियार बरामदगी मामला

घटना के असली जिम्मेदारों की भी तय हो जवाबदेही-कांग्रेस

32 साल बाद अदालत ने माना— उत्तराखंड आंदोलनकारियों को झूठे मुकदमे में फंसाने के लिए गढ़े गए थे साक्ष्य

अविकल उत्तराखण्ड

मुजफ्फरनगर/ देहरादून। मुजफ्फरनगर की विशेष सीबीआई अदालत ने 1994 के रामपुर तिराहा (मुजफ्फरनगर) कांड से जुड़े कथित फर्जी हथियार बरामदगी मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। 30 जून का यह फैसला गोलीकांड या दुष्कर्म के मुख्य मुकदमों का नहीं, बल्कि आंदोलनकारियों को झूठे हथियार बरामदगी के मामले में फंसाने से जुड़े मुकदमे का था।

उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान वर्ष 1994 के रामपुर तिराहा कांड में आंदोलनकारियों पर फर्जी हथियार बरामदगी का मुकदमा दर्ज करने के मामले में विशेष सीबीआई अदालत ने तत्कालीन थाना प्रभारी समेत तीन पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई है।

विशेष न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीबीआई) प्रथम देवेंद्र सिंह फौजदार की अदालत ने तत्कालीन झिंझाना थाना प्रभारी ब्रजकिशोर सिंह, कांस्टेबल उमेश चंद्र और अनिल कुमार को दोषी मानते हुए प्रत्येक को डेढ़-डेढ़ वर्ष के कारावास तथा 21-21 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई। अदालत ने तीनों को निजी मुचलके पर रिहा भी कर दिया।

अभियोजन के अनुसार, 2 अक्टूबर 1994 को पृथक उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर दिल्ली जा रहे आंदोलनकारियों को मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर रोका गया था। पुलिस फायरिंग में सात आंदोलनकारियों की मौत हो गई थी। इसके बाद आंदोलनकारियों को हमलावर साबित करने के उद्देश्य से उनके खिलाफ अवैध हथियार बरामदगी का मुकदमा दर्ज किया गया।

बाद में मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई। जांच में हथियारों की बरामदगी फर्जी पाई गई और सीबीआई ने संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने तीनों आरोपियों को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई।

यह फैसला रामपुर तिराहा कांड से जुड़े उन मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिनमें आंदोलनकारियों को झूठे मुकदमों में फंसाने के आरोप लगे थे।

अदालत का फैसला
विशेष सीबीआई अदालत ने तत्कालीन थाना प्रभारी बृज किशोर तथा सिपाही अनिल कुमार और उमेश कुमार को दोषी ठहराया।

तीनों को आपराधिक साजिश (Criminal Conspiracy) और झूठे साक्ष्य तैयार कर उत्तराखंड आंदोलनकारियों को हथियार रखने के झूठे मुकदमे में फंसाने का दोषी पाया गया।

मामला क्या था?

1-2 अक्टूबर 1994 को उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर हजारों आंदोलनकारी दिल्ली जा रहे थे।
मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा पर पुलिस ने उन्हें रोक दिया। इसके बाद लाठीचार्ज, गोलीबारी और महिला आंदोलनकारियों के साथ दुष्कर्म व उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगे।
उसी दौरान पुलिस ने दावा किया कि आंदोलनकारियों से तमंचे और खुखरी बरामद हुए हैं और उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दिया।
सीबीआई जांच में फॉरेंसिक रिपोर्ट से सामने आया कि जिन तमंचों और कारतूसों को बरामद दिखाया गया था, वे आपस में मेल नहीं खाते थे। इससे पुलिस की बरामदगी संदिग्ध साबित हुई और सीबीआई ने संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया।

फैसले का महत्व

यह घटना के करीब 32 वर्ष बाद आया फैसला है। अदालत ने माना कि उत्तराखंड आंदोलनकारियों को झूठे मुकदमे में फंसाने के लिए साक्ष्य गढ़े गए थे।
हालांकि, रामपुर तिराहा गोलीकांड, दुष्कर्म और अन्य अत्याचारों से जुड़े कई अन्य मुकदमे अभी भी अलग-अलग अदालतों में लंबित हैं।

रामपुर तिराहा फैसले का कांग्रेस ने किया स्वागत

डॉ. प्रतिमा सिंह बोलीं— घटना के असली जिम्मेदारों की भी तय हो जवाबदेही

उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी की प्रवक्ता डॉ. प्रतिमा सिंह ने रामपुर तिराहा कांड में न्यायालय द्वारा सुनाए गए हालिया फैसले का स्वागत करते हुए इसे उत्तराखंड राज्य आंदोलन के शहीदों के संघर्ष को न्याय दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय राज्य आंदोलन के सात शहीदों की स्मृति और उनके परिजनों के लिए न्याय का प्रतीक है।

डॉ. सिंह ने कहा कि रामपुर तिराहा कांड उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने वर्ष 2024 में पीएसी के दो दोषी जवानों को आजीवन कारावास की सजा दिए जाने के फैसले का भी स्वागत किया था और पार्टी का स्पष्ट मत है कि इस कांड में शामिल प्रत्येक दोषी को दंड मिलना चाहिए।

उन्होंने आरोप लगाया कि इस पूरे घटनाक्रम के लिए जिम्मेदार उच्च पदस्थ अधिकारी और निर्णय लेने वाले लोग अब भी कानून के दायरे से बाहर हैं। उन्होंने कहा कि उनकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। डॉ. सिंह ने कहा कि रामपुर तिराहा की घटना ने उत्तराखंड राज्य आंदोलन को नई गति दी और अंततः पृथक राज्य के गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ। उन्होंने सभी राज्य आंदोलनकारियों और सातों शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि कांग्रेस उनके सम्मान और अधिकारों की लड़ाई आगे भी मजबूती से लड़ती रहेगी।

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